सोचा न था यूं होगी हमारी दूसरी मुलाकात

suman-sarinअभी कुछ महीने ही हुये थे मुझे और रघुनाथ को नवभारत टाइम्स ज्वाइन किये हुए. संपादक महोदय की शानदार 38 साल की पारी के बाद उनका विदाई समारोह था. वहीं हुई थीं सुमनजी से हमारी पहली मुलाकात. हमारे लिए बड़े भाईतुल्य उनके पति कैलाश सेंगर ने उनसे मेरा और रघुनाथ सरन का परिचय कराया. गोरा रंग, सौम्य चेहरा और बोली में मातृत्व की मिठास… कुल मिलाकर आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थी वो. बस इतनी ही मुलाकात थी हमारी उनसे, मगर आगे के दिनों में पहचान गहरी होती चली गई.

मेरे और रघु के मिलनसार व्यवहार से हम दोनों जल्द ही नवभारत टाइम्स परिवार में चहेते तो सबके बन गये थे… लेकिन कैलाश भैया के दिल में हमारे लिए कुछ खास सी जगह बन गई.

रात में अक्सर मैं, रघु और कैलाश भैया साथ घर लौटा करते. रास्ते में देश-दुनिया और दूसरी तमाम तरह की चर्चाओं के बीच उनकी चर्चा जरूर होती. भैया हमारे बारे में भी घर पर सुमनजी को बताते रहते. इन छोटी-छोटी चर्चाओं ने हमारी पहचान को गहरा किया. उनसे दूबारा मिलने की कई योजनाएं बनी, मगर मुम्बईया आपधापी में योजनाएं ही रह गईं.

मेरे और रघु दोनों के लिए नवभारत टाइम्स इतिहास हो गया मगर कैलाश भैया और उनसे हमारे संबंध हमारे भविष्य का आधार बनें रहे.

वो बहुत बीमार रहा करतीं. पिछले दो-एक साल से तो कुछ ज्यादा ही. वो थोड़ी संकोची भी थी, तभी तो हम जब भी उनसे मिलने के लिए उनके घर जाने की योजना बनाते वो भैया को ये कहकर मना कर देतीं कि ये दोनों बच्चे (उनके और कैलाश भैया के लिए हम दोनों बच्चे ही थे) पहली बार हमारे घर आयेंगे और मैं बिस्तर पर बीमार पड़ी रहूं… अच्छा नहीं लगेगा.

हम भी उनसे मिलने के लिए उनके बिस्तर छोड़ने का इंतजार करने लगे. आखिर उन्होंने बिस्तर छोड़ दिया. हम उनसे मिल भी आये… हमने उनकी अर्थी को कांधा दिया. पहली बार किसी की अंतिम यात्रा में शामिल हुआ मैं. इस मुम्बई शहर में जहां भीड़ ज्यादा और रिश्ते कम है… हमने एक रिश्ता खो दिया.

कोशिश की हमारे रघु ने उस रिश्ते को एक नाम देने की. बीमारी के दिनों में सुमनजी से वह लंबी बातें करता… उन्हें मायूस नहीं होने देता. जब डॉक्टरों को हताशा ही हाथ लग रही थी उस समय वो बिहार में अपने चाचाजी से जड़ी-बुटियां मंगा रहा था. उनकी सलामती के लिए वह अपने आध्यात्मिक गुरुजी के पास भी जा पहुंचता. अंतिम यात्रा में भी रघु सबसे पहले पहुंचने वालों में था.

यहां उस वाक्या का जिक्र जरूरी हो जाता है जब इस सुहागिन की विदाई के लिए फूल और साड़ी लाने रघु बाज़ार जा रहा था, कैलाश भैया ने उसे कुछ पैसे दिये जिसे लेने से वह इनकार कर रहा था. उस पगले को यह मालूम था कि इस मौके पर खर्चने का हक़ सिर्फ कैलाश भैया का था, फिर भी वो ऐसा कह रहा था. आग्रह करने पर भी उसने भैया से सिर्फ आधे पैसे ही स्वीकार किये… और जवाब दिया, “इस मौके पर खर्च करने का हक़ बेटे को भी है.”
काश… वहां निस्तेज पड़ी सुमनजी इस रिश्ते को जी जातीं.