गुरू के गुरू मनिरत्नम

2007_Guruकहीं पढ़ा था कि फिल्म गुरू के प्रीमियर पर जुनियर बच्चन का अभिनय देख बिग बी की आंखें नम हो गई. हो भी क्यों न?

किसी भी बेटे की तरक्की पर हर पिता इसी तरह तो खुशी मनाते हैं. गुरू फिल्म में छोटे बच्चन वाकई बड़े हो गये दीखते हैं. अमिताभ बच्चन के बेटे होने के नाते अभिषेक की झोली हमेशा फिल्मों से भरी रही लेकिन वे एक बेहतर अभिनेता भी हैं इसकी झलक मनिरत्नम की ही फिल्म युवा में देखने को मिली थी. मनिरत्नम ने युवा फिल्म में अभिषेक के भीतर अभिनय का जो पौधा लगाया था गुरू तक वो एक बरगद का रूप ले चुका है.

इस फिल्म में अभिषेक ने क्या कमाल का अभिनय किया है. यूं तो इस फिल्म में बहुत कुछ है देखने को लेकिन अगर किसी एक चीज के लिए यह फिल्म देखनी हो तो बेशक़ वो बात अभिषेक का अभिनय ही है. फिर भी इसका सारा श्रेय मैं अभिषेक को नहीं दूंगा. अगर दर्शक भूले न हों तो कुछ दिनों पहले ही धूम 2 में इसी अभिषेक पर ऋतिक बहुत भारी पड़े थे. बात साफ है श्रेय निर्देशक मनिरत्नम के सिर. मनिरत्नम हमेशा से ही मुख्यधारा में घुसकर सार्थक फिल्में बनाते रहे हैं. राजकपूर की तरह समसामयिक सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्मों की विषयवस्तु बनाने वाले मणि की रोज़ा, बाम्बे, दिल से, युवा जैसी फिल्में किसे याद नहीं? फिल्म गुरू में भी उन्होंने एक बड़ा प्रसांगिक मुद्दा उठाया है. एक मामूली गंवई गुरुकांत देसाई (अभिषेक बच्चन) का अपने सपने और उसे पूरा करने के जुनून के बूते देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बनने की कहानी के माध्यम से मणिरत्नम ने उदारीकरण के दौर में बदलते भारत की तस्वीर पेश करने की कोशिश की है. देश-विदेश के अर्थशास्त्री जहां आंकड़ों के माध्यम से भारत की तरक्की का हिसाब समझा रहे हैं वहीं फिल्मकार ने इसके पीछे के समाजशास्त्र को समझते-समझाते हुए देश के विकास और आम आदमी की क्षमताओं पर अपना विश्वास जताया है.

ये तो हुई अभिषेक के अभिनय और मणि के विजन की बात. इस फिल्म के दूसरे पहलू पर भी गौर किया जाय तो गुरू एक बेहतरीन फिल्म साबित होती है. वैसे भी बेहतर कप्तान उसे ही माना जाता है जो अपनी टीम को बेहतर काम के लिए प्रेरित कर सके. मणिरत्नम एक बेहतर कप्तान हैं यह बात फिल्म के लगभग हर विभाग के प्रदर्शन से जाहिर होता है. वो चाहे ए आर रहमान का संगीत हो या गुलजार के गीत, राजीव मेनन की सिनेटोग्राफी हो या श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग. सबने अपना बेहतर देने की कामयाब कोशिश की है. मणिरत्नम के स्क्रीनप्ले को संवाद करने लायक बनाने में लेखक विजय कृष्ण आचार्य ने भी खूबसूरती से शब्दों का चयन किया है. बी और सी ग्रेड की फिल्मों में व्यस्त रहने के बावजुद भी क्यों लोग मिठुन चक्रवर्ती को हमेशा ए ग्रेड का मानते हैं यह गुरू में उनका प्रदर्शन देखकर सहज ही समझा जा सकता है. मुख्यधारा में इसे दादा की जोरदार वापसी का आगाज़ माना जाना चाहिये. ऐश्वर्य राय भी अच्छी लगी है. दक्षिण में मणि की खास पसंद माधवन के लिए इस फिल्म करने को कुछ खास तो नहीं था फिर भी जहां भी मौका मिला, प्रभावित किया है. एक अपाहिज की भूमिका विद्या बालन ने भी भी अपनी क्षमता का परिचय दिया है.

कुल मिलाकर मैं यही कर सकता हूं कि गुरू से एक मुलाकात कर ही लेनी चाहिये.