वो तेरी बहकी बहकी बातें

वो तेरी बहकी बहकी बातें
और उनको थामते हम
जाम से गर छलक जाये जो चंद बूंदें
आह भरते तुम, … और कहते
देख छोड़ चली जाम को माशूक
फिर बनता एक और जाम
चलता रहता वो बहकना मुसल्लसल
बहकते थे यूं जो तुम पहिले
मोहल्ले भर को ख़बर होती थी
आज बहकने को पंचाग बांचते हो