मेरे बारे में

Shashi SINGH

जड़ें झारखंड के जंगलों और खदानों के रास्ते बिहार के मैदानों तक जाती हैं। बचपन रजरप्पा में कोयला खदानों के आँगन में बीता। कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई हज़ारीबाग के संत कोलम्बा और बनारस के बीएचयू में हुई। रोटी की तलाश में भटकता हुआ मुम्बई आ धमका। सन 2000 से यहीं तम्बू ताने हुए हैं। इस दौरान कई तरह के पहचान जुड़े और बिछड़े। टेलीविजन पर मायावी दुनिया गढ़ने से लेकर पत्रकारिता में दुनिया की हकीकत बयां करने तक का सफर तय किया है। सास-बहू धारावाहिकों के समन्दर में कुछेक लोटा पानी हमने भी डाला है। तब लेखक कहलाये। नवभारत टाइम्स में जब पन्ने काले किये तक पत्रकार कहलाये। न्यू मीडिया की पौध जब पनप ही रही थी तभी उसकी डाल पर जा बैठे और अर्ली बर्ड इन न्यू मीडिया कहलाये। बात 2004 की है जब मोबाइल के खाते में हम दर्ज  हो गए और वोडाफोन (तब ओरेंज) की नौकरी में लग गए। बीच में कुछ दिनों के लिए ज़ी टीवी वालों के न्यू मीडिया विभाग में भी सेवाएं दी। नौकरी से मन उचट गया। इन सबको टाटा बाय-बाय कर आयें। फिलहाल विशुद्ध रूप से आवारागर्दी कर रहा हूँ। लोग इस आवारागर्दी को उद्यमी होना भी कहते हैं। पता नहीं, लेकिन मजा आ रहा है इस यात्रा में…

क्या कहा? मुझ जैसे आवारा आपको पसंद है! फिर देर किस बात की? नीचे के खानों में भरो अपना नाम-धाम… एक से भले दो!